CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sparsh Part-2 • Poetry (Kavya Khand)
शब्दार्थ: बानी = भाषा/बोली, आपा = अहंकार (Ego), सीतल = ठंडा/शांत।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपने मन का 'अहंकार' (Ego) त्याग कर ऐसी मीठी और मधुर भाषा (Sweet words) बोलनी चाहिए जिससे सुनने वाले के मन को सुख और शांति मिले। मीठी वाणी बोलने से न केवल दूसरों को खुशी मिलती है, बल्कि इससे हमारा अपना मन (तन और हृदय) भी शांत और शीतल रहता है। क्रोध और अहंकार मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।
शब्दार्थ: कस्तूरी = सुगन्धित पदार्थ, कुंडलि = नाभि (Navel), मृग = हिरण, घटि-घटि = कण-कण/हर हृदय में।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि जिस प्रकार 'कस्तूरी' (Musk) नामक अत्यंत सुगंधित पदार्थ हिरण की 'अपनी नाभि' (Navel) में ही होता है, परंतु वह अज्ञानी हिरण उसकी सुगंध से पागल होकर पूरे जंगल (वन) में उसे ढूँढ़ता फिरता है। ठीक उसी प्रकार, राम (ईश्वर) प्रत्येक मनुष्य के 'हृदय' (घट-घट) में बसते हैं, परंतु अज्ञानी दुनिया (इंसान) उन्हें अपने अंदर न देखकर मंदिर-मस्जिद और तीर्थों में ढूँढ़ती फिरती है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए आत्मज्ञान (Self-realization) ज़रूरी है।
शब्दार्थ: मैं = अहंकार (Ego/I), हरि = भगवान, अँधियारा = अज्ञानता का अंधेरा।
भावार्थ: कबीर कहते हैं कि 'मैं' (अहंकार) और 'हरि' (ईश्वर) दोनों एक साथ एक ही हृदय में वास नहीं कर सकते। जब मेरे मन में 'अहंकार' था, तब मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई। और अब जब मुझे ईश्वर के दर्शन हो गए हैं, तो मेरे मन का सारा अहंकार खत्म हो गया है। जिस प्रकार एक ज्ञान रूपी 'दीपक' (Lamp) के जलते ही घर का सारा 'अँधेरा' (अज्ञान) मिट जाता है, उसी प्रकार प्रभु-भक्ति से मन का सारा अज्ञान और अंधकार दूर हो जाता है।
शब्दार्थ: सुखिया = सुखी (Happy), खावै अरु सोवै = खाता और सोता है, दुखिया = दुखी।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार बहुत ही अज्ञानी (Ignorant) है। लोग सिर्फ 'खाने और सोने' (अर्थात सांसारिक सुखों और भौतिकवाद) में खुश रहते हैं और मानते हैं कि वे सुखी हैं। दूसरी ओर, कबीर स्वयं को 'दुखी' मानते हैं; वे दुखी इसलिए हैं क्योंकि वे अज्ञानता की नींद से 'जाग चुके हैं'। वे सांसारिक लोगों की इस दुर्दशा (अज्ञानता) को और ईश्वर से उनके बिछड़ने (Separation) को देखकर दिन-रात रोते रहते हैं (ईश्वर के 'वियोग' में तड़पते हैं)।
शब्दार्थ: बिरह = अपनों से बिछड़ने का दुःख (Separation), भुवंगम = साँप (Snake), बौरा = पागल (Mad)।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि जब शरीर के अंदर अपनों (राम) से बिछड़ने का 'विरह रूपी साँप' (Snake of Separation) बस जाता है, तो उस पर कोई भी मंत्र या दवा असर नहीं करती। यानी जब किसी भक्त को राम (ईश्वर) का वियोग (Separation) सताता है, तो उसकी पीड़ा बहुत असहनीय होती है। जो सच्चा राम-भक्त होता है, वह ईश्वर के वियोग में जीवित ही नहीं रह पाता; और अगर वह किसी तरह जीवित बच भी जाए, तो वह ईश्वरीय प्रेम में 'पागल' (Mad/Insane) हो जाता है (उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं रहता)।
शब्दार्थ: निंदक = बुराई या आलोचना करने वाला व्यक्ति (Critic), नेड़ा = पास (Near), निरमल = स्वच्छ/पवित्र, सुभाइ = स्वभाव (Nature)।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति हमारी 'निंदा' (Criticism) करता है या हमारी बुराइयाँ निकालता है, उसे हमेशा अपने सबसे 'करीब' (पास) रखना चाहिए। हो सके तो उसके लिए अपने घर के आँगन में एक कुटिया बनवा देनी चाहिए। क्योंकि आलोचक हमारे सामने हमारी कमियां (Faults) बताता है, जिससे हम बिना 'साबुन' और 'पानी' के ही अपने स्वभाव और मन (Nature) को स्वच्छ (निर्मल) बना सकते हैं। निंदक हमारा सबसे बड़ा हितैषी होता है।
शब्दार्थ: पोथी = मोटी धार्मिक पुस्तकें (Books), मुवा = मर गया, पीव = ईश्वर या प्रियतम (Love), पंडित = सच्चा ज्ञानी।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि इस संसार में लोगों ने मोटी-मोटी और बड़ी-बड़ी धार्मिक किताबें (पोथियाँ) पढ़-पढ़ कर अपना जीवन बिता दिया और मर गए, लेकिन 'कोई भी सच्चा पंडित (ज्ञानी) नहीं बन पाया।' सच्चा ज्ञानी बनने के लिए बहुत सी किताबें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है; जो मनुष्य ईश्वरीय प्रेम (Love for God/Humanity) का 'एक अक्षर' (अढ़ाई आखर प्रेम का) पढ़ लेता है या उसे समझ लेता है, असल में वही सच्चा पंडित (ज्ञानी) होता है। ईश्वर को केवल 'प्रेम' से पाया जा सकता है, 'किताबी ज्ञान' से नहीं।
प्रश्न 1: कबीर ने 'कस्तूरी मृग' (कस्तूरी वाले हिरण) के माध्यम से क्या संदेश दिया है?
उत्तर: कबीरदास जी ने कस्तूरी मृग के माध्यम से यह समझाया है कि जैसे कस्तूरी हिरण की नाभि (Navel) में ही होती है, पर वह अज्ञानतावश उसे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है; ठीक वैसे ही ईश्वर मनुष्य के हृदय में, उनके घट-घट (कण-कण) में वास करता है। परंतु अज्ञानी मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मंदिर, मस्जिद और तीर्थ-स्थानों में भटकता रहता है। ईश्वर को पहचानने के लिए आत्मज्ञान (Self-realization) की आवश्यकता होती है, बाह्य दिखावे की नहीं।
प्रश्न 2: "दीपक देख्या माहिं"—दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यहाँ 'दीपक' का अर्थ 'ज्ञान और ईश्वर-भक्ति' (Knowledge/God) है और
'अँधियारे' का अर्थ इंसान का 'अहंकार' (Ego) और 'अज्ञान' (Ignorance) है।
कबीर कहते हैं कि जब तक मन में 'मैं' (अहंकार) होता है, तब तक ईश्वर के दर्शन नहीं होते। लेकिन जैसे ही
हृदय में 'ईश्वरीय ज्ञान और प्रेम' का दीपक जलता है, मनुष्य के मन की अज्ञानता, स्वार्थ और अहंकार रूपी
अंधकार तुरंत नष्ट हो जाता है। अर्थात ज्ञान के प्रकाश से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।
प्रश्न 3: कबीर ने निंदक (बुराई करने वाले) को अपने पास (नेड़ा) रखने की सलाह क्यों दी है?
उत्तर: कबीर के अनुसार निंदक 'साबुन और पानी' के बिना ही हमारे स्वभाव को शुद्ध (निर्मल) कर देता है। इसलिए उन्होंने निंदक को अपने सबसे करीब (आँगन में कुटिया बनाकर) रखने की सलाह दी है। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने हमारी कमियां (Faults) और बुराइयां बताता है, तो हमें उस पर क्रोधित होने के बजाय अपनी ग़लतियों को सुधारने का अवसर मिलता है। इससे व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव पवित्र (Clean character) हो जाता है। अतः निंदक हमारा सबसे बड़ा हितैषी (Well-wisher) होता है।
प्रश्न 4: संसार के सुखी और कबीर के 'दुखी' होने का असली कारण क्या है?
उत्तर: संसार के लोग भौतिक सुखों (सुविधाओं) में फँसे हुए हैं। वे सिर्फ
'खाने और सोने' को ही असली सुख मानते हैं और 'अज्ञानता की नींद' में सो रहे हैं।
दूसरी ओर, कबीर स्वयं को दुखी मानते हैं क्योंकि वे अज्ञानता से 'जाग' चुके हैं और उन्हें परम-सत्य
(ईश्वर) का ज्ञान हो गया है। वे सांसारिक लोगों की इस दुखद दशा को देखकर रोते हैं। साथ ही, वे सच्चे साधक
हैं और परमात्मा (राम) के 'वियोग' (Separation) में तड़प रहे हैं, इसलिए वे दिन-रात जागे और दुखी रहते हैं।